नई दिल्ली
पाकिस्तान में बैठे आतंकी सीक्रेट चैटिंग के लिए अब पोर्न वेबसाइट्स का इस्तेमाल कर रहे हैं। सुरक्षा अधिकारियों ने रविवार को बताया कि आतंकी संगठन और पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI इसका सबसे ज्यादा यूज कर रहे हैंञ
आतंकी इसके जरिए जम्मू-कश्मीर में भर्ती किए गए लोगों तक मैसेज पहुंचा रहे हैं। ताकि पारंपरिक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर निगरानी से बचा जा सके।
अधिकारियों ने बताया कि इन पोर्नोग्राफी प्लेटफॉर्म पर रियल-टाइम चैट टूल मौजूद होते हैं। जो आसपास डेट (पार्टनर) ढूंढने में मदद करने के नाम पर काम करते हैं। लेकिन हैंडलर्स इनका इस्तेमाल आतंकी गतिविधि के लिए कर रहे हैं।
आतंकी टोर नेटवर्क का भी इस्तेमाल कर रहे
सुरक्षा एजेंसियों ने कई खास डिजिटल टूल्स की जांच शुरू की है। आतंकी हैंडलर कोटेक्स और कोनियन जैसे टोर आधारित मैसेजिंग ऐप्स का भी इस्तेमाल कर रहे हैं। ये ऐप्स डेटा को एन्क्रिप्टेड नोड्स के जरिए भेजते हैं और यूजर की पहचान छिपाते हैं।
अधिकारियों के मुताबिक, भारत में कोनियन की एपीके फाइल तक पहुंच पर रोक है। एपीके यानी एंड्रॉयड पैकेज किट वह फाइल फॉर्मेट है, जिसका इस्तेमाल एंड्रॉयड ऑपरेटिंग सिस्टम मोबाइल ऐप्स को बांटने और इंस्टॉल करने के लिए करता है।
चीन, फ्रांस के ऐप भी आतंकियों के फेवरेट
इसके अलावा, आतंकी फ्रांस बेस्ड ऐसे ऐप का भी इस्तेमाल कर रहे हैं, जिसमें सिम कार्ड या फोन नंबर की जरूरत के बिना एंड-टू-एंड एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग की सुविधा है। इससे यूजर की पहचान करना मुश्किल हो जाता है।
एजेंसियां वियतनाम आधारित ऐप्स की भी निगरानी कर रही हैं। इसके साथ ही मूनचैट जैसे गुमनाम प्लेटफॉर्म भी जांच के दायरे में हैं।
मूनचैट में पीजीपी-एन्क्रिप्टेड वर्जन शामिल हैं, जिनके चीनी मूल के होने का शक है और इनमें पारंपरिक रजिस्ट्रेशन की जरूरत नहीं होती।
मूनचैट के कई वर्जन ऐसे हैं, जिनका इस्तेमाल आसपास मौजूद सिंगल लोगों को खोजने के लिए किया जाता है।
भारत में पोर्न एप्स VPN के जरिए डाउनलोड हो रहे
अधिकारियों के मुताबिक, भारत में पोर्नोग्राफी वाले कई ऐप्स पर रोक है। इसके बावजूद इन्हें वर्चुअल प्राइवेट नेटवर्क यानी वीपीएन के जरिए गैरकानूनी तरीके से डाउनलोड किया जा रहा है।
VPN इंटरनेट पर एक सुरक्षित और एन्क्रिप्टेड कनेक्शन बनाता है। यह इंटरनेट प्रोटोकॉल एड्रेस छिपाता है और ऑनलाइन ट्रैफिक को एन्क्रिप्ट करता है, जिससे ऑनलाइन गतिविधियों पर नजर रखना और डेटा तक पहुंचना मुश्किल हो जाता है।
2जी नेटवर्क पर भी चलने वाले ऐप्स का इस्तेमाल
सुरक्षा अधिकारियों ने पाया कि हैंडलर और घाटी में मौजूद आतंकी भर्ती किए गए लोग ऐसे खास ऐप्स पर निर्भर थे, जो धीमी 2जी या एज नेटवर्क स्पीड में भी काम करते हैं।
इनमें से कुछ ऐप्स पर रजिस्ट्रेशन के लिए यूजर को फोन नंबर या ईमेल तक देने की जरूरत नहीं होती।
नई रणनीति का खुलासा सुरक्षा बलों की विदेशी कंपनियों द्वारा बनाई गई वर्चुअल सिम के इस्तेमाल को रोकने की कोशिश के दौरान हुआ।
वर्चुअल सिम ऐसी तकनीक है, जो कंप्यूटर को फोन नंबर बनाने की सुविधा देती है। इन नंबरों का इस्तेमाल खास ऐप्स के जरिए स्मार्टफोन पर किया जा सकता है और इससे डिजिटल निशान बहुत कम बचते हैं।
इसका पहली बार खुलासा 2019 के पुलवामा आतंकी हमले की जांच के दौरान हुआ था। इस हमले में सीआरपीएफ के 40 जवानों की मौत हुई थी।



