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पूर्वी हिमालय पर मंडरा रहा ‘कैस्केडिंग डिजास्टर’ का खतरा, नेपाल की बाढ़ ने बढ़ाई चिंता

नई दिल्ली 
नेपाल-तिब्बत सीमा पर हाल ही में ग्लेशियर टूटने से आई भीषण बाढ़ ने पूरे पूर्वी हिमालयी क्षेत्र में 'कैस्केडिंग डिजास्टर' यानी एक के बाद एक जुड़ने वाली आपदाओं के गंभीर खतरे को लेकर सवाल खड़े कर दिए दिया है। 'द टाइम्स ऑफ इंडिया' की रिपोर्ट के अनुसार, विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि भूकंप, बर्फ/चट्टान का भूस्खलन, मूसलाधार बारिश या ग्लेशियर झील का फटना एक ऐसी विनाशकारी श्रृंखला शुरू कर सकता है जो सैकड़ों किलोमीटर दूर तक तबाही मचा सकती है।

नेपाल में लहेंडे खोला और भोटेकोशी नदी में मलबे के भारी सैलाब ने यह साबित किया कि यह बहु-स्तरीय आपदा कितनी तेजी से फैलती है। भले ही इस घटना को शुरू में भूकंप समझा गया था, लेकिन अमेरिकी भूगर्भीय सर्वेक्षण (USGS) ने पुष्टि की कि लगभग 1.2 किलोमीटर की ऊंचाई से गिरे बड़े हिमखंड और चट्टानों के प्रभाव से ही 5.2 तीव्रता के भूकंप जैसी कंपन पैदा हुई थी।

दार्जिलिंग के लिए चेतावनी क्यों महत्वपूर्ण है?
दार्जिलिंग जिले में सिक्किम जैसी ऊंची और विशाल ग्लेशियर झीलें मौजूद नहीं हैं, फिर भी यह क्षेत्र उसी नाजुक और भूगर्भीय रूप से अस्थिर हिमालयी तंत्र का हिस्सा है।

दार्जिलिंग हाई रिस्क वाले 'जोन IV' में आता है। तेज भूकंप के झटके पहाड़ी ढलानों को ढीला कर सकते हैं, जिससे नदियों के रास्ते ब्लॉक हो सकते हैं।

मूसलाधार बारिश और कमजोर पहाड़ियों के कारण भूस्खलन बार-बार आते रहते हैं। अक्टूबर 2025 में 12 घंटे के भीतर 300 mm से ज्यादा बारिश ने व्यापक भूस्खलन और मलबे का बहाव पैदा किया था, जिसमें 24 लोगों की जान चली गई थी।

'जर्नल ऑफ एनवायरनमेंटल मैनेजमेंट' की स्टडी में दार्जिलिंग-सिक्किम उच्चभूमि क्षेत्र को बहुत ज्यादा बाढ़-संवेदनशील कैटेगरी में रखा गया है।

हिमालय में कैसे काम करती है 'कैस्केडिंग आपदाओं' की श्रृंखला?
विशेषज्ञों का मानना है कि सबसे बड़ा खतरा किसी एक अकेली प्राकृतिक आपदा से नहीं, बल्कि एक आपदा से दूसरी आपदा को जन्म देने से है।

पहाड़ी ढलानों से बर्फ या चट्टानों का भारी मलबा खिसकता है।खिसका हुआ मलबा नदी के प्राकृतिक बहाव को रोककर एक अस्थायी झील बना देता है।

पानी का दबाव बढ़ने पर जब यह प्राकृतिक बांध अचानक टूटता है, तो नीचे की ओर उफनती हुई फ्लैश फ्लड आती है।

ऊपरी हिस्से में हिमस्खलन ग्लेशियर झील में गिरकर इतनी बड़ी लहरें पैदा कर सकता है कि झील की मोरेन दीवारें टूट जाती हैं।

बंगाल और मैदानी इलाकों तक बढ़ता GLOF का खतरा
ऊपरी हिमालय में ग्लेशियर झील फटने (GLOF) का सीधा असर नीचे बसे बंगाल के उत्तरी जिलों तक पहुंचता है।

अक्टूबर 2023 में उत्तरी सिक्किम की 'साउथ ल्होनक झील' फटने से तीस्ता नदी में आई अचानक बाढ़ ने कलिम्पोंग और पश्चिम बंगाल के मैदानी इलाकों में भारी तबाही मचाई थी, जिससे पुल और राष्ट्रीय राजमार्ग (NH-10) बह गए थे।

मॉडलों के अनुसार, संभावित GLOF घटनाओं से बंगाल-सिक्किम सीमा के आसपास 10,000 से ज्यादा लोग, 1,900 इमारतें, 5 पुल और 2 हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट सीधे तौर पर प्रभावित हो सकते हैं।

वैज्ञानिकों की लॉन्ग टर्म चेतावनी
'इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट' (ICIMOD) के अनुसार, पूर्वी हिमालयी क्षेत्र 2050 तक पीक GLOF जोखिम सीमा पर पहुंच सकता है।

इतन ही नहीं इस सदी के अंत तक पूरे हिंदू कुश हिमालयी क्षेत्र में GLOF का खतरा तीन गुना तक बढ़ सकता है।

बढ़ते तापमान के कारण पर्वतीय परमाफ्रॉस्ट यानी जमी हुई बर्फ और मिट्टी पिघल रही है, जिससे पहाड़ियों को थामने वाली प्राकृतिक पकड़ कमजोर हो रही है।

आपदा प्रबंधन की रणनीति में बदलाव की जरूरत
नेपाल की घटना ने साफ कर दिया है कि भू-विज्ञानियों और आपदा प्रबंधन तंत्रों को अब अलग-अलग आपदाओं के बजाय पूरे नदी-बेसिन को एक इंटीग्रेटेड यूनिट मानकर योजनाएं बनानी होंगी। इसमें ग्लेशियर झीलों की रीयल-टाइम मॉनिटरिंग, ढलानों पर अनियंत्रित निर्माण पर रोक, भूकंप-रोधी संरचनाएं और हिमालय की चोटियों से लेकर बंगाल के निचले इलाकों तक एक मजबूत 'अर्ली वार्निंग सिस्टम' तैयार करना बहुत जरूरी है।

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