मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रविंद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि कानून की समयसीमा सभी के लिए समान है और सरकारी विभागों को भी तय अवधि के भीतर कार्रवाई करनी चाहिए। अदालत ने देरी को लापरवाहीपूर्ण और अस्पष्टीकृत मानते हुए राज्य सरकार की अपील को समयसीमा से बाधित बताया।
मामला नारायणपुर जिले के ओरछा थाना क्षेत्र में दर्ज नक्सल प्रकरण से जुड़ा है। इस केस में चंपा कर्मा, मांगी मंडावी, संकू मंडावी और लच्छू मंडावी के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता, आर्म्स एक्ट और यूएपीए की गंभीर धाराओं के तहत अपराध दर्ज किया गया था। विशेष न्यायाधीश, एनआईए एक्ट एवं अनुसूचित अपराध न्यायालय, नारायणपुर ने सितंबर 2025 में आरोपियों को डिफॉल्ट बेल दे दी थी।
राज्य सरकार ने इस आदेश को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में अपील दायर की, लेकिन यह निर्धारित समयसीमा से 182 दिन बाद दाखिल हुई। सरकार की ओर से दलील दी गई कि विभागीय मंजूरी, दस्तावेज जुटाने और फाइल प्रक्रिया में समय लगने के कारण देरी हुई।
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि “देरी माफी अपवाद है, अधिकार नहीं।” अदालत ने कहा कि यदि पर्याप्त और संतोषजनक कारण प्रस्तुत नहीं किए जाते, तो देरी को स्वीकार नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने यह भी कहा कि सरकारी मशीनरी की लापरवाही का लाभ शासन को नहीं दिया जा सकता।
खंडपीठ ने देरी माफी आवेदन खारिज करते हुए राज्य सरकार की अपील को स्वतः निरस्त कर दिया।



