छत्तीसगढ़

111 कार्यकर्ताओं के इस्तीफे के बाद BJP का बड़ा फैसला, शहर मंडल भंग..

डोंगरगढ़। छत्तीसगढ़ के डोंगरगढ़ में भारतीय जनता पार्टी का मजबूत संगठन इन दिनों गंभीर अंतर्कलह का सामना कर रहा है। कभी कांग्रेस के गढ़ को लगातार तीन विधानसभा चुनावों में ध्वस्त करने वाला भाजपा संगठन आज 111 कार्यकर्ताओं के सामूहिक इस्तीफे, सोशल मीडिया विवाद, नोटिस, निष्कासन और मंडल कार्यसमिति भंग होने जैसी घटनाओं से चर्चा में है।

संगठन के भीतर असंतोष की शुरुआत मंडल अध्यक्ष पद को लेकर मानी जा रही है। लंबे समय तक अमित जैन के लगातार तीन कार्यकाल और बाद में जसमीत सिंह बन्नोंआना की नियुक्ति के बाद कार्यकर्ताओं के एक वर्ग ने बदलाव की मांग उठाई। इसी दौरान परिवारवाद और करीबी लोगों को जिम्मेदारी दिए जाने के आरोप भी सामने आए, हालांकि पार्टी ने इन आरोपों को आधिकारिक रूप से स्वीकार नहीं किया।

नाराजगी धीरे-धीरे बढ़ती गई और हालात तब बिगड़ गए जब 111 कार्यकर्ताओं ने सामूहिक इस्तीफा दे दिया। इसके बाद सोशल मीडिया पर पार्टी और वरिष्ठ नेताओं के खिलाफ पोस्ट किए जाने लगे, जिसे संगठन ने अनुशासनहीनता माना।

मामले को शांत करने के लिए जिला संगठन ने नोटिस जारी किए, कार्यकर्ताओं से जवाब मांगा और डोंगरगढ़ में बैठक भी की। लेकिन विवाद नहीं थमा। इसके बाद मामला प्रदेश नेतृत्व तक पहुंचा।

प्रदेश संगठन के निर्देश पर भाजपा ने डोंगरगढ़ शहर मंडल कार्यसमिति को भंग कर दिया। साथ ही प्रिंस कक्कड़, अनिल पाण्डेय, वीरेंद्र साहू, संतोष राव और परविंदर सिंह मोंटी को छह वर्षों के लिए पार्टी से निष्कासित कर दिया गया।

जिला भाजपा अध्यक्ष कोमल सिंह राजपूत ने कहा कि कुछ कार्यकर्ता बहकावे में आकर पार्टी और वरिष्ठ नेताओं के खिलाफ लगातार सोशल मीडिया पर लिख रहे थे, जिससे संगठन की छवि प्रभावित हो रही थी। उन्होंने बताया कि सभी प्रक्रियाओं के बाद कोर कमेटी की अनुशंसा पर प्रदेश नेतृत्व ने कार्रवाई की।

हालांकि मंडल भंग होने के बाद कई नाराज कार्यकर्ताओं ने राहत जताई है, जबकि निष्कासित नेताओं को लेकर संगठन के भीतर मतभेद अभी भी बने हुए हैं। कई कार्यकर्ता निष्कासन वापस लेने या सभी मामलों में समान कार्रवाई की मांग कर रहे हैं।

डोंगरगढ़ भाजपा का यह घटनाक्रम केवल एक मंडल के भंग होने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह संगठन के भीतर लंबे समय से चल रही असंतोष, गुटबाजी और नेतृत्व को लेकर उठ रहे सवालों का खुला संकेत माना जा रहा है। अब सभी की नजर इस बात पर है कि नई संगठनात्मक व्यवस्था पार्टी को दोबारा मजबूती दिला पाएगी या यह विवाद आगे और गहराएगा।

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