रांची
झारखंड की राजधानी रांची में जेपीएससी और जेएसएससी परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं के खिलाफ छात्रों का आंदोलन कई दिनों से जारी है। जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम अब ‘रांची का जंतर-मंतर’ कहला रहा है।
दिल्ली के जंतर-मंतर पर हालिया NEET पेपर लीक आंदोलन के बाद अब रांची का यह प्रदर्शन भी सुर्खियों में है। दोनों आंदोलन परीक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता की मांग करते हैं, लेकिन मुद्दा, उम्र, भाषा, नेतृत्व और लक्ष्य में बड़ा अंतर है। जानिए 10 प्रमुख बिंदुओं में जंतर-मंतर और रांची प्रोटेस्ट में क्या फर्क है।
1. मुख्य मुद्दा
जंतर-मंतर पर राष्ट्रीय स्तर की मेडिकल प्रवेश परीक्षा NEET-UG में पेपर लीक और परीक्षा प्रणाली की खामियों का मुद्दा था। वहीं रांची में राज्य स्तरीय भर्ती परीक्षाओं—JPSC सिविल सेवा और JSSC-CGL—में कथित धांधली, कटऑफ में गड़बड़ी, OMR हेरफेर और सीटें बेचने के आरोप लगाए जा रहे हैं। एक जगह एडमिशन का सवाल है, दूसरी जगह सरकारी नौकरी का।
2. मांगों का फोकस
दिल्ली में मुख्य मांग शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे और NTA जैसी संस्थाओं में सुधार की थी। रांची में छात्र 14वीं JPSC परीक्षा रद्द करने, पूरे मामले की CBI या बाहर के जजों से जांच कराने और भर्ती प्रक्रिया में स्थायी पारदर्शिता की मांग पर अड़े हैं। यहां व्यक्तिगत इस्तीफे से ज्यादा व्यवस्थागत बदलाव पर जोर है।
3. प्रदर्शनकारियों की उम्र
जंतर-मंतर ज्यादातर Gen-Z (14 से 29 साल) का आंदोलन था, क्योंकि NEET 12वीं के बाद दी जाती है। रांची में बड़ी संख्या में 25 से 35-40 साल तक के अभ्यर्थी हैं, जो कई सालों से प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं। उनकी लड़ाई सिर्फ परीक्षा नहीं, बल्कि उम्र सीमा खत्म होने से पहले नौकरी पाने की है।
4. भाषा और आचरण
दिल्ली में कुछ जगहों पर गाली-गलौज, अभद्र भाषा और तीखे पोस्टर देखने को मिले। रांची में प्रदर्शन अपेक्षाकृत शांतिपूर्ण और मर्यादित रहा। छात्र अपनी मांगों वाली तख्तियों और नारों के साथ आगे बढ़े, व्यक्तिगत हमलों या अभद्रता से ज्यादातर दूर रहे।
5. नेतृत्व और संगठन
जंतर-मंतर में CJP और सोनम वांगचुक जैसे चेहरों ने आंदोलन को एकजुट रखा। रांची में आंदोलन दो अलग स्टेज और ग्रुप में बंटा दिखता है—एक देवेंद्रनाथ महतो के नेतृत्व में और दूसरा JPSC-JSSC रिफॉर्म मंच के तहत। मांगें भी थोड़ी अलग-अलग हैं, जिससे एक आवाज कमजोर पड़ती है।
6. स्तर (राष्ट्रीय बनाम राज्य)
जंतर-मंतर राष्ट्रीय मुद्दा बन गया था और केंद्र सरकार पर सीधा दबाव बना। रांची का प्रोटेस्ट मुख्य रूप से झारखंड सरकार, JPSC और JSSC के खिलाफ राज्य स्तरीय आंदोलन है। राष्ट्रीय मीडिया का फोकस भी दिल्ली जितना तेज नहीं रहा।
7. सोशल मीडिया और स्टाइल
दिल्ली में मीम, रील्स, डांस वीडियो और व्यंग्यात्मक पोस्टर काफी वायरल हुए। रांची में पारंपरिक तरीके से तख्तियां, झंडे और सीधा मुद्दा-केंद्रित प्रदर्शन ज्यादा दिखता है। यहां रील्स का ग्लैमर कम और असली दर्द ज्यादा नजर आता है।
8. कोड ऑफ कंडक्ट
रांची के छात्रों ने खुद “कोड ऑफ कंडक्ट” लागू किया—सिर्फ मुद्दे पर बात करें, गाली-गलौज न करें, राजनीतिक नारे न लगाएं और आंदोलन को किसी पार्टी का मंच न बनने दें। जंतर-मंतर में ऐसा सख्त स्व-नियंत्रण कम दिखा, जहां कुछ जगहों पर विवादित नारे भी लगे।
9. राजनीतिक हस्तक्षेप
दिल्ली में राजनीतिक नेताओं की सीधी भागीदारी, नारे और समर्थन ज्यादा दिखाई दिए। रांची में छात्र बार-बार साफ कर रहे हैं कि वे किसी पार्टी के लिए नहीं लड़ रहे, बल्कि व्यवस्था सुधार के लिए। हालांकि स्थानीय स्तर पर कुछ राजनीतिक समर्थन जरूर मिला है।
10. उद्देश्य की प्रकृति
जंतर-मंतर पर मुख्य रूप से एडमिशन और उच्च शिक्षा का सवाल था। रांची में यह सीधे रोजगार, बेरोजगारी और वर्षों की मेहनत-पैसे के बर्बाद होने का मुद्दा है। यहां अभ्यर्थी अपनी और परिवार की आजीविका की लड़ाई लड़ रहे हैं।
वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ चौधरी कहते हैं, दोनों आंदोलन युवाओं के गुस्से और परीक्षा व्यवस्था पर सवाल उठाते हैं, लेकिन रांची का प्रदर्शन रोजगार की असली जद्दोजहद, अनुशासन और राज्य स्तरीय मुद्दों के कारण दिल्ली से अलग पहचान बना रहा है।



