नई दिल्ली
संजू सैमसन, आखिर कब तक? तीन मैच, दो नाकामियां और एक बड़ी पारी, जिस पर दो-दो जीवनदान का एहसान है. वेस्टइंडीज के खिलाफ मौजूदा टी20 सीरीज में संजू के बल्ले से 11, 82 और 3 रन निकले हैं. रांची में 82 रन बनाकर उन्होंने जरूर उम्मीद जगाई, लेकिन उस पारी की चमक के पीछे छिपी हकीकत भी देखिए. जब वह 6 रन पर थे, तब उनका कैच छूटा. 42 पर उन्हें दूसरा जीवनदान मिला. यानी संजू की पारी को दो बार विपक्षी टीम ने खुद मौका दिया. सवाल है कि क्या एक बड़ी पारी और दो जीवनदान के सहारे ही भारतीय टीम में उनकी जगह बची रहनी चाहिए?
सवाल इसलिए भी बड़ा है, क्योंकि टीम के पास एक ऐसा किशोर बल्लेबाज मौजूद है, जिसने अपनी विस्फोटक बल्लेबाजी से दुनिया का ध्यान खींचा है. नाम है वैभव सूर्यवंशी. लेकिन वैभव को मौका मिले, उससे पहले संजू को लगातार मौके दिए जा रहे हैं. पांच मैचों की सीरीज के तीन मुकाबले बीत चुके हैं. अब सिर्फ दो मैच बाकी हैं. ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि क्या टीम मैनेजमेंट अब भी संजू को आजमाता रहेगा या वैभव को मैदान पर उतारने का साहस दिखाएगा?
एक पारी के दम पर कब तक बचेगी जगह?
संजू की 82 रनों की पारी को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. लेकिन किसी खिलाड़ी का आकलन सिर्फ उसकी सर्वश्रेष्ठ पारी के आधार पर नहीं होता. टी20 क्रिकेट में असली परीक्षा प्रदर्शन में निरंतरता है. संजू ने पहले मैच में 11 रन बनाए, दूसरे में 82 और तीसरे में सिर्फ 3 रन बनाकर लौट गए. तीन पारियों का यह उतार-चढ़ाव एक बार फिर वही सवाल खड़ा करता है, जो उनके करियर के साथ लंबे समय से जुड़ा रहा है- क्या संजू अपनी प्रतिभा को लगातार प्रदर्शन में बदल सकते हैं?
रांची में मिली दो जीवनदान की बात इसलिए अहम है, क्योंकि बड़े स्तर पर बल्लेबाज को हर बार ऐसे मौके नहीं मिलते. अगर कैच पकड़ लिए जाते, तो क्या संजू की पारी 82 रनों तक पहुंचती? इसका जवाब कोई निश्चित तौर पर नहीं दे सकता. लेकिन इतना जरूर है कि उनकी पारी को परखते समय इन मौकों का जिक्र जरूरी है. रन बने, यह अच्छी बात है. मगर उन रनों के पीछे मिले अवसरों को भुलाकर सिर्फ स्कोरकार्ड देखकर फैसला करना भी सही नहीं होगा.
वैभव कब तक देखेंगे ड्रेसिंग रूम से तमाशा?
दूसरी तरफ वैभव सूर्यवंशी हैं, जिनकी प्रतिभा पर दुनिया तालियां बजा चुकी है, लेकिन भारतीय टीम में उन्हें अपनी बारी का इंतजार है. टीम में चुनकर भी मैदान से दूर रखना, किसी युवा खिलाड़ी के लिए इससे बड़ी विडंबना क्या होगी? वैभव ने अपनी विस्फोटक बल्लेबाजी से बड़े-बड़े गेंदबाजों के पसीने छुड़ाए हैं, फिर भी अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में खुद को साबित करने का मौका उनके हाथ नहीं आया. अगर टीम मैनेजमेंट ने उन्हें चुना है, तो उनकी काबिलियत पर भरोसा भी जताया होगा. फिर उस भरोसे को आजमाने से परहेज क्यों? आखिर वैभव को मौका देने के लिए और कितनी दस्तक का इंतजार है?
वैभव सूर्यवंशी ने छोटी उम्र में ही अपने बल्ले से बड़े-बड़े गेंदबाजों को चुनौती दी है. उनकी बल्लेबाजी में जो बेखौफ अंदाज दिखता है, उसने उन्हें खास पहचान दिलाई है. बेशक, आईपीएल और अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट के दबाव में फर्क है. वैभव को भी टीम इंडिया की जर्सी में उतरकर अपनी काबिलियत साबित करनी होगी. लेकिन सवाल है कि जब उन्हें मैदान पर उतरने का मौका ही नहीं मिलेगा, तो उनकी असली परीक्षा होगी कैसे? प्रतिभा को बेंच पर बैठाकर नहीं, मैदान में उतारकर परखा जाता है. वैभव को मौका दिए बिना उनके बारे में फैसला सुनाना आखिर कितना जायज है?
अब सीरीज में दो ही मैच बचे हैं. यही वह समय है, जब टीम मैनेजमेंट को भविष्य को ध्यान में रखकर फैसला करना चाहिए. अगर वैभव को मौका देना है, तो अभी क्यों नहीं? क्या हर बार संजू की एक बड़ी पारी का इंतजार किया जाएगा? और अगर संजू लगातार रन नहीं बना पा रहे हैं, तो क्या सिर्फ उनकी पुरानी उपलब्धियों के आधार पर उन्हें आगे भी खिलाते रहना उचित है?
औसत 27 से नीचे, फिर भी सवालों से बाहर क्यों?
संजू का टी20 अंतरराष्ट्रीय बल्लेबाजी औसत 27 से नीचे आ चुका है. यह आंकड़ा अपने आप में किसी खिलाड़ी की पूरी कहानी नहीं बताता, लेकिन जब खराब पारियों और अच्छी पारी के बीच बड़ा अंतर दिखाई दे, तो सवाल पूछना जरूरी हो जाता है. भारतीय टीम में जगह किसी की स्थायी जागीर नहीं हो सकती. यहां प्रदर्शन, टीम की जरूरत और भविष्य की योजनाओं को बराबर महत्व मिलना चाहिए.
संजू को बाहर करने की मांग का मतलब यह नहीं कि उनमें प्रतिभा नहीं है. उनकी प्रतिभा पर सवाल नहीं है, सवाल उस प्रतिभा से मिलने वाले नतीजों पर है. आखिर कब तक उम्मीद के आधार पर जगह मिलती रहेगी? कब तक एक बड़ी पारी पिछली नाकामियों पर पर्दा डालती रहेगी? और कब तक किसी दूसरे खिलाड़ी को मौका देने का फैसला टलता रहेगा?
संजू की जगह या वैभव का भविष्य?
अब तस्वीर साफ है. वेस्टइंडीज के खिलाफ सीरीज के दो मैच बाकी हैं. टीम मैनेजमेंट के सामने विकल्प मौजूद है. वह संजू को एक और मौका देकर उनकी फॉर्म पर भरोसा जता सकता है, या वैभव को उतारकर यह देख सकता है कि युवा बल्लेबाज अंतरराष्ट्रीय स्तर पर क्या कर सकता है.
लेकिन फैसला सिर्फ एक खिलाड़ी को खिलाने या दूसरे को बाहर बैठाने का नहीं है. यह टीम की सोच का सवाल है. क्या भारत भविष्य के लिए नए विकल्प तैयार करना चाहता है, या पुराने विकल्पों को बार-बार आजमाने में ही उलझा रहेगा?
संजू को अपनी जगह बचाने का पूरा अधिकार है, लेकिन वैभव को मौका पाने का हक भी कम नहीं है. संजू की नाकामी अपने आप वैभव की सफलता की गारंटी नहीं बनती, मगर वैभव को मौका न देना उनकी परीक्षा शुरू होने से पहले ही रोक देना है.
अब संजू के सामने बल्ले से जवाब देने की चुनौती है और टीम मैनेजमेंट के सामने फैसले की. सीरीज के आखिरी दो मैच बताएंगे कि भारतीय टीम सिर्फ आज का स्कोर देख रही है या कल की टीम भी तैयार कर रही है. वैभव को मौका मिलेगा या नहीं, यह फैसला टीम मैनेजमेंट का है. लेकिन एक सवाल का जवाब उन्हें देना ही होगा- जबकिशोर प्रतिभा दरवाजे पर खड़ी है, तो उसे अंदर आने का मौका आखिर कब मिलेगा?



