रायपुर / धमतरी जिले का मगरलोड विकासखण्ड आज ग्रामीण अर्थव्यवस्था और आधुनिक कृषि की एक नई गाथा लिख रहा है। यहाँ के ग्राम पंचायत केकराखोली में ‘सेवा संकल्प अभियान’ के अंतर्गत शासकीय योजनाओं के समन्वित उपयोग से कृषि के परिदृश्य में अभूतपूर्व बदलाव आया है। वीबी-जी रामजी और उद्यानिकी विभाग के संयुक्त अभिसरण से संचालित समेकित फल उद्यान योजना ने गाँव के 25 किसानों की जीवनशैली और खेती के तरीकों को एक नया आयाम दिया है, जिससे लगभग 35 एकड़ भूमि अब लहलहाते फलोद्यानों और बहुफसली कृषि गतिविधियों का केंद्र बन चुकी है।
केकराखोली के इस मॉडल की सबसे बड़ी खासियत भूमि का वैज्ञानिक और रणनीतिक उपयोग है। किसानों ने अपनी ज़मीन पर केवल पारंपरिक फसलें उगाने के बजाय आम और कटहल जैसे दीर्घकालिक फलदार पौधों के साथ-साथ हल्दी, उड़द, करेला और बरबटी जैसी अल्पकालिक फसलों की अंतरवर्ती (इंटरक्रॉपिंग) खेती शुरू की है। इसके अतिरिक्त सतावर और सिंदूरी जैसे औषधीय पौधों को भी खेतों का हिस्सा बनाया गया है। जब तक फलदार वृक्ष बड़े होकर उत्पादन देना शुरू नहीं करते, तब तक किसान इन छोटी अवधि की फसलों से नियमित आय प्राप्त कर रहे हैं, जिससे उनकी दैनिक और मौसमी वित्तीय ज़रूरतें सहजता से पूरी हो रही हैं।
खेती को सुरक्षित और तकनीकी रूप से सक्षम बनाने के लिए केवल पौधे लगाना ही काफी नहीं था, इसलिए योजना के तहत मजबूत अवसंरचनात्मक ढांचा भी तैयार किया गया। खेतों को आवारा मवेशियों और सुरक्षात्मक दृष्टिकोण से सुरक्षित करने के लिए घेराबंदी (फेंसिंग), निर्बाध सिंचाई के लिए बोरवेल और पौधों को प्रतिकूल मौसम से बचाने के लिए ग्रीन शेड हाउस जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराई गईं। विभागीय संसाधनों के इस एकीकृत समन्वय ने किसानों को एक संरक्षित और आधुनिक कृषि आधार प्रदान किया है।
जल संरक्षण और अतिरिक्त आजीविका के उद्देश्य से ग्राम पंचायत में 07 आजीविका डबरियों का निर्माण भी किया गया है। ये डबरियाँ न केवल खेतों की सिंचाई और भू-जल स्तर को बनाए रखने में मददगार साबित हो रही हैं, बल्कि स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल इनमें मछली पालन भी किया जा रहा है। इससे किसानों को पारंपरिक खेती के साथ-साथ जल-आधारित आय का एक नया और टिकाऊ विकल्प मिल गया है, जो उनकी कुल आय में इज़ाफ़ा कर रहा है।
केकराखोली का यह एकीकृत कृषि मॉडल आज अल्पकालिक आय, दीर्घकालिक फलदार उत्पादन और मत्स्य पालन जैसी अतिरिक्त आजीविका को एक सूत्र में पिरोकर आत्मनिर्भरता की मिसाल पेश कर रहा है। 25 किसानों के सामूहिक प्रयास और शासकीय योजनाओं के सफल अभिसरण से विकसित यह 35 एकड़ का क्षेत्र पूरे राज्य के लिए एक प्रेरक उदाहरण बन चुका है। यह पहल स्पष्ट करती है कि जब किसान की अटूट मेहनत, उपलब्ध संसाधन और सही शासकीय योजनाएं एक साथ मिलती हैं, तो ग्रामीण समृद्धि की एक मजबूत और स्थायी नींव तैयार होती है।



